खबर लहरिया Blog यूपी में बढ़ती जनसंख्या और रोज़गार

यूपी में बढ़ती जनसंख्या और रोज़गार


उत्तरप्रदेश भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 20 करोड़ लोग यूपी में रहते हैं। यह संख्या देश की आबादी से 16 प्रतिशत अधिक है। इसका अर्थ यह है कि उन लोगों को रोज़गार मिलना मुमकिन नहीं है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार, 2020 में यूपी की बेरोज़गारी दर 58 प्रतिशत हो चुकी है। जिस राज्य की आधी से ज़्यादा जनसंख्या बेरोज़गार हो, वहां रोज़गार मिल-पाना सपना सा ही है। साथ ही अगर मौजूदा रोज़गार लोगों के इच्छा अनुसार हो या नही। वह उसे करेंगे। ऐसे अन्य बहुत से लोग है जो उनकी जगह ले सकते हैं। जब रोज़गार के अवसर कम और काम करने वालो की संख्या ज़्यादा होती है तो प्रतिस्पर्धा होना आम है।
रोज़गार हेतु शहरों की ओर पलायन होते लोग

यूपी में करीब 55 फीसदी लोग खेती करते हैंउसी से अपना घर चलाते हैंउत्तर प्रदेश के जालौन जिले में छोटी चट्टानी पहाड़ियों से घिरी पाहुज नदी के समीप स्थित 42 घरों का एक गाँव है तिलियायह बुंदेलखंड के कई गांवो में से एक हैयहां ज्यादातर ग्रामीण किसान हैं। 25 जुलाई 2016 की लाइव मिंट रिपोर्ट कहती है की ज़्यादातर युवा ही गांव से रोज़गार की तलाश में शहरों की तरफ जाते हैंमानसून के मौसम और बेमौसम बरसात के कारण फसले बर्बाद हो जाती हैंकोई और रोज़गार की सुविधा होने के कारण लोगों के पास पलायन करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता

2014 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (एनआईडीएम) एक रिपोर्ट पेश करती है। उसके अनुसार बुंदेलखंड के गांवों के प्रवासियों को ज़रूरी संसाधन न मिलने के कारण वे पलायन करते हैं। कुछ तो सिर्फ यह सोच कर निकल जाते हैं कि जब गाँव में चीज़े बेहतर हो जाएंगी, तब वे लौट आएंगे।
महामारी और गांव की तऱफ पलायन करते मज़दूर

दिसंबर 2019 में आई महामारी कोविड-19 ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। इसके साथ ही यह भी पता चल गया कि देश में रोज़गार के कितने अवसर हैं। 22 मार्च 2020 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशबन्दी की घोषणा की। यह सुनते ही जितने भी लोग गांवो से शहरों की तरफ आए हुए थे अपने घरों की ओर लौटने लगे। यह सब यूपी, बिहार से आए मज़दूर थे। जिनकी संख्या हज़ारो नहीं लाखों में थी। यह लाखों की संख्या साफ़ दिखाती थी की यूपी में रोज़गार के अवसर कितने ज़्यादा या कम है।
रोज़गार में कमी का कारण

रोज़गार में सबसे बड़ी कमी का कारण लोगों के लिए उनके अनुसार काम का न होना है। उत्तरप्रदेश में बेरोज़गार शिक्षित युवाओं की संख्या 2018-20 तक 33 लाख हो गयी है। यह संख्या उत्तरप्रदेश के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने राज्य विधानसभा में पेश की थी। प्रत्येक 100 व्यक्तियों में से लगभग 10 व्यक्ति बेरोजगार हैं।

कुछ युवा तो ज़्यादा फीस के कारण पढ़ ही नहीं पाते। 2020 में बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी ने अपने सारे कोर्स की फीस 20-90 प्रतिशत बढ़ा दी। ऐसे में जो छात्र कम आय वाले घरों से आते हैं वह यह फीस कैसे देंगे। 3 जून 2020 की गांव कनेक्शन की रिपोर्ट में एक छात्र मानवेन्द्र सिंह अपनी परेशानी बताता है। वह चारगांव, झांसी का निवासी है।
उसे इंटीग्रेटेड कोर्स में प्रवेश लेना है लेकिन उसकी फीस अब दोगुनी कर दी गयी है। उसके पिता एक किसान है। वह बताता है की मार्च 2020 में हुई बर्फ़बारी की वजह से उनकी सारी फसल बर्बाद हो गयी। ऐसे में वे दोगुनी फीस नहीं भर सकते। जिनके पास शिक्षा है वह भी बेरोज़गार हैं। जिसके पास नहीं वह अपने हालात से मज़बूर है।
राज्य में उद्योग एवं संसाधन की कमी
PHDCCI ( पी.एच.डी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) के अंबरीश रस्तोगी बताते हैं कि उद्योग एक विकट स्थिति का सामना कर रहा है ।भारत में अधिकांश शिक्षित बेरोजगार हैं क्योंकि उनके पास नौकरी के लिए कोई विशेष कौशल नहीं है। यूपी में स्थिति अजीब है। लोग शिक्षित तो है लेकिन उनके पास पर्याप्त कौशल नहीं हैं। जो की उद्योगों में काम करने के लिए चाहिए।
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल को ‘ग्रामोदय से भारत उदय’ कार्यक्रम की शुरुआत की। इस योजना को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जैसा ही माना जा रहा है। इसकी शुरुआत के पहले केंद्र ने मनरेगा की मजदूरी देने के लिए 694 करोड़ रुपए की बकाया राशि मध्यप्रदेश सरकार को जारी की। जैसे : मध्यप्रदेश में मनरेगा की मजदूरी देश के बाकी राज्यों की अपेक्षा सबसे कम है। यहां प्रतिदिन 167 रुपए मजदूरी दी जा रही थी, जो कि इस साल 2020 में 1 अप्रैल तक सिर्फ 159 रुपए दैनिक कर दी गयी थी।
योजना के अनुसार हर व्यक्ति को 100 दिन का रोज़गार दिया ही जाएगा। लेकिन बुंदेलखंड में की हुई रिसर्च बताती है की ज़मीनी तौर में सबको काम नहीं मिलता ( बुंदेलखंड.इन)। सरकारी रिकॉर्ड में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष औसतन 68 दिनों का काम दिखाया जाता है। जमीन पर, कई लोगों ने पांच साल में 50 दिन भी काम नहीं किया।  सरकार कहती है कि वह पैसे लोगों के बैंको में डालेगी। ज़मीनी तौर पर तो किसी के बैंक खाते खुले ही नहीं हैं, तो पैसे कहाँ जाएंगे? 
लॉकडाउन में रोज़गार गारंटी योजना का काम

कोरोना संकट के समय में मनरेगा में रोजगार देने के मामले में उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे रहा। राज्य में 15 जून तक 57 लाख 12 हज़ार मजदूरो को मनरेगा में काम मिला। देश में मनरेगा के तहत कुल रोजगार में उत्तर प्रदेश की भागीदारी 18 फीसदी रही । उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर राजस्थान रहा जहाँ 53.45 लाख मजदूरो को काम मिला।
इसके बाद तीसरे नंबर पर 12 फीसदी भागीदारी के साथ 36.58 लाख मजदूरों को रोजगार देने में आन्ध्र प्रदेश रहा। इसके बाद पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश चौथे और पांचवें स्थान में हैं। दोनों ही राज्यों ने 26.72 और 23.95 लाख मजदूरों को मनरेगा में रोजगार उपलब्ध कराया। यहां सवाल यह है कि यह ज़मीनी तौर पर कितना सच और कितना बनावटी है। जिन्हें काम मिला है उन्हें उनका वेतन भी दिया गया है या नहीं।
जॉब कार्ड के लिए आवेदन करना

मनरेगा के तहत काम पाने के लिए, एक परिवार को अपनी ग्राम पंचायत (निर्वाचित ग्राम परिषद) से एक मनरेगा जॉब कार्ड के लिए आवेदन करना होगा। प्रत्येक परिवार एक जॉब कार्ड का हकदार है। कार्ड में उस घर से किसी का भी नाम हो सकता है। आवेदन करने के बाद, 15 दिनों के अंदर एक घर को जॉब कार्ड प्रदान किया जाएगा। एक परिवार के पास एक कार्ड होने के बाद, वे ग्राम पंचायत से मनरेगा में काम करने के लिए कह सकता है।
100 दिन का काम
परिवार हर वर्ष 100 दिनों के काम की मांग कर सकता है। इसे अलगअलग ब्लॉकों में विभाजित किया जा सकता है (न्यूनतम समय 14 दिन है) या एक ही बार में लिया जा सकता है। इसे घर के सदस्यों के बीच भी बांटा जा सकता है। ग्राम पंचायत से अनुरोध किए जाने के 15 दिनों के अंदर काम दिया जाता है। अगर कोई ग्राम पंचायत काम नहीं देती, तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा।
भुगतान
मजदूरों को दिया जाने वाला धन राज्यों के बीच अलग होता है।काम का भुगतान घर के बैंक खाते द्वारा दिया जाता है। अगर पैसे देने में देरी होती है तो उसका मुआवज़ा भी मिलेगा।